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क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं

Author: Gurjar Upendra

Date: 21-08-2015   Total Views : 370

क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं 
नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ

जुनूँ ये मजबूर कर रहा है पलट के देखूँ 
ख़ुदी ये कहती है मोड़ मुड़ जा 
अगरचे एहसास कह रहा है

खुले दरीचे के पीछे दो आँखें झाँकती हैं 
अभी मेरे इंतज़ार में वो भी जागती है 
कहीं तो उस के गोशा-ए-दिल में दर्द होगा

उसे ये ज़िद है कि मैं पुकारूँ 
मुझे तक़ाज़ा है वो बुला ले 
क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं

नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ

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